Written by/ विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है।यही वह सर्वोच्च राष्ट्रीय मंच है जहाँ देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएँ, समस्याएँ,अपेक्षाएँ और भविष्य की नीतियाँ कानून का स्वरूप ग्रहण करती हैं।संसद केवल विधेयक पारित करने की संस्था नहीं है।यह सरकार की जवाबदेही तय करने,विपक्ष को अपनी बात रखने, जनहित के प्रश्नों पर चर्चा करने और राष्ट्रीय सहमति का रास्ता तलाशने का संवैधानिक मंच है।
संसद का मानसून सत्र 2026 आज 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। 20 जुलाई से शुरू हुए इस सत्र की 25 दिनों की अवधि में कुल 19 बैठकें हुईं।सत्र के दौरान लोकसभा में 11और राज्यसभा में 2 विधेयक पुरःस्थापित किए गए। दोनों सदनों द्वारा कुल 12 विधेयक पारित किए गए।लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत और राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत रही।इन आँकड़ों को केवल संसदीय रिकॉर्ड का हिस्सा मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं होगा।
इनके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है।संसद को जितना समय जनता के प्रश्नों,कानूनों और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा के लिए उपलब्ध कराया गया था,उसका कितना हिस्सा वास्तव में सार्थक संसदीय कार्य में बदल पाया?यही सवाल इस मानसून सत्र की सबसे बड़ी तस्वीर सामने रखता है।संसद की कार्यवाही के लिए निर्धारित प्रत्येक घंटा देश की जनता की अमानत है।प्रश्नकाल में सांसद सरकार से सवाल पूछते हैं। शून्यकाल में तत्काल जनहित के मुद्दे उठाए जाते हैं।विधेयकों पर चर्चा होती है।सरकार की नीतियों की समीक्षा होती है। बजट और अनुदानों पर विचार किया जाता है।देश के विभिन्न हिस्सों की समस्याएँ राष्ट्रीय मंच तक पहुँचती हैं।
ऐसे में संसद की कार्यवाही का एक घंटा केवल घड़ी की सुई पर बीतने वाला समय नहीं है।वह लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक घंटा है।लंबे समय से संसदीय व्यय के संबंध में प्रति मिनट लगभग ढाई लाख रुपये के सार्वजनिक खर्च का अनुमान सामने आता रहा है।इस अनुमान के आधार पर एक घंटे की कार्यवाही का खर्च लगभग डेढ़ करोड़ रुपये बैठता है।आठ घंटे के कार्यदिवस के हिसाब से यह राशि लगभग 12 करोड़ रुपये तक पहुँच सकती है।
इसमें सांसदों के वेतन और भत्ते, संसद सचिवालय,सुरक्षा,तकनीकी व्यवस्था,अनुवाद,प्रसारण, बिजली, रखरखाव और हजारों कर्मचारियों पर होने वाला खर्च शामिल है।इसलिए जब संसद की कार्यवाही हंगामे और स्थगन के कारण बाधित होती है तो नुकसान केवल संसदीय समय का नहीं होता। उसके साथ जनता के धन और लोकतांत्रिक अवसर दोनों प्रभावित होते हैं।यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।संसद के लिए निर्धारित समय और वास्तविक कार्य समय एक समान नहीं होते। किसी सत्र के लिए जितने घंटे निर्धारित किए जाते हैं, वे सांसदों को कानून बनाने, प्रश्न पूछने और जनहित के विषय उठाने का अवसर प्रदान करते हैं। यदि व्यवधान के कारण उस समय का उपयोग नहीं हो पाता तो वह समय वापस नहीं आता।
यही संसदीय गतिरोध की सबसे बड़ी कीमत है।संसद के पिछले मानसून सत्र का अनुभव भी इस चिंता को और गंभीर बनाता है। वर्ष 2025 के मानसून सत्र में लोकसभा के लिए निर्धारित 120 घंटों में लगभग 37 घंटे ही बैठक हो सकी थी। व्यवधान के कारण प्रश्नकाल भी व्यापक रूप से प्रभावित हुआ था।यह आँकड़ा बताता है कि संसदीय समय की बर्बादी कोई नई समस्या नहीं है।मानसून सत्र 2026 में भी कम उत्पादकता का आँकड़ा हमारे सामने है।लोकसभा की 19 प्रतिशत और राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत उत्पादकता यह बताती है कि सदनों को उपलब्ध कराए गए संसदीय समय का बड़ा हिस्सा अपेक्षित काम में नहीं बदला जा सका।
फिर भी इस सत्र को पूरी तरह निष्फल कहना उचित नहीं होगा। दोनों सदनों ने 12 महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए हैं। लोक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम को मजबूत करने वाला संशोधन युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम है।परीक्षा में अनियमितता केवल एक विद्यार्थी के भविष्य को प्रभावित नहीं करती।वह पूरी परीक्षा व्यवस्था के प्रति युवाओं के विश्वास को चोट पहुँचाती है।
जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण में संशोधन प्रशासनिक पारदर्शिता और अभिलेखों की विश्वसनीयता से जुड़ा है। बैंककार बही साक्ष्य विधेयक डिजिटल युग की बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाने का प्रयास है।आज बैंकिंग रिकॉर्ड केवल कागज़ पर नहीं रहते।वे इलेक्ट्रॉनिक,डिजिटल,वर्चुअल और क्लाउड आधारित स्वरूप में भी मौजूद हैं।सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यम विकास संशोधन विधेयक देश के छोटे कारोबारियों और उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण है।
MSME क्षेत्र रोजगार और आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ है।पंजीकरण को सरल बनाना,वित्त तक पहुँच आसान करना और विलंबित भुगतान से जुड़े विवादों का शीघ्र समाधान छोटे उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
अधिकरण सुधार विधेयक न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था की दक्षता से जुड़ा है। खान और खनिज क्षेत्र में प्रस्तावित बदलाव देश की आर्थिक आवश्यकताओं और आत्मनिर्भर भारत की व्यापक रणनीति से जुड़े हैं।राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम से संबंधित संशोधन सहकारी क्षेत्र को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में है।वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण देने वाला प्रावधान राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ा है। राष्ट्रगीत केवल शब्दों और संगीत का संयोजन नहीं है।उसके साथ स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियाँ और राष्ट्रीय चेतना जुड़ी हुई है।
केरल का नाम बदलकर केरलम करने का प्रस्ताव भी संवैधानिक प्रक्रिया और क्षेत्रीय पहचान से संबंधित महत्वपूर्ण विषय है। विदेशी अभिदाय विनियमन संशोधन विधेयक को दोनों सदनों की संयुक्त समिति को भेजा जाना इस बात का उदाहरण है कि जटिल विधेयकों पर विस्तृत विचार के लिए समिति व्यवस्था का उपयोग किया जा सकता है।
इन उपलब्धियों के बावजूद संसद के कामकाज पर प्रश्न इसलिए उठते हैं क्योंकि कानून बनाना और कानून पर पर्याप्त चर्चा करना दो अलग-अलग बातें हैं।
किसी विधेयक का पारित होना संसदीय प्रक्रिया का अंतिम चरण है।उसके पहले उसमें निहित प्रावधानों पर बहस,सुझाव, संशोधन और विपक्ष के तर्कों को सुनना भी लोकतंत्र की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।संसद की गुणवत्ता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितने विधेयक पारित हुए। यह भी देखना होगा कि उन विधेयकों पर कितनी गंभीर चर्चा हुई।लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना है।सरकार से जवाब माँगना है।
जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाना है सरकार का दायित्व है कि वह विपक्ष की आवाज़ सुने और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा का पर्याप्त अवसर दे।परन्तु विरोध और व्यवधान में अंतर है।विरोध लोकतंत्र को मजबूत करता है। व्यवधान लोकतंत्र की कार्यक्षमता को कमजोर करता है।यदि प्रश्नकाल बाधित होता है तो जनता के प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते।यदि शून्यकाल बाधित होता है तो तत्काल जनहित के अनेक विषय सदन तक नहीं पहुँच पाते। यदि विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती तो कानून निर्माण की लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती है।यह भी कहना उचित नहीं होगा कि हर व्यवधान के लिए केवल विपक्ष जिम्मेदार है।सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों संसद की गरिमा और कार्यवाही के लिए समान रूप से उत्तरदायी हैं।
विपक्ष को अपनी आवाज़ बुलंद रखने का अधिकार है। सरकार को जवाब देने का दायित्व है।दोनों के बीच संवाद का रास्ता खुला रहना चाहिए।संसद किसी राजनीतिक दल का मंच नहीं है।यह पूरे राष्ट्र की संस्था है।आज देश विकास की तेज़ गति से आगे बढ़ रहा है।रेल,सड़क, रक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष,हरित ऊर्जा,’कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विनिर्माण और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में बड़े बदलाव हो रहे हैं।ऐसे समय में संसद का प्रत्येक कार्यदिवस राष्ट्रीय महत्व रखता है।किसान अपनी समस्याओं का समाधान चाहता है।युवा रोजगार और परीक्षा व्यवस्था पर जवाब चाहता है। छोटे व्यापारी वित्त और कारोबार की कठिनाइयों पर चर्चा चाहते हैं।आम नागरिक महँगाई, शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा और विकास के प्रश्नों पर सरकार से जवाब चाहता है।इन सभी सवालों का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच संसद है।
इसलिए संसद का काम केवल यह गिनना नहीं होना चाहिए कि कितने विधेयक पारित हुए। यह भी देखना होगा कि कितने घंटे सार्थक चर्चा हुई।कितने प्रश्नों के उत्तर दिए गए। .कितने जनहित के विषय उठे।कितने घंटे व्यवधान में चले गए।यही संसदीय उत्पादकता का वास्तविक अर्थ है।संसद में गतिरोध की कीमत केवल रुपये में नहीं आँकी जा सकती।सबसे बड़ी कीमत लोकतांत्रिक विश्वास की होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे उसकी आवाज़ संसद में उठाएँ।यदि वही संसद बार-बार हंगामे और स्थगन की तस्वीर प्रस्तुत करे तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके प्रतिनिधियों को मिला समय आखिर किस काम आया?
संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद कोई असामान्य बात नहीं है। सरकार और विपक्ष के बीच टकराव भी लोकतंत्र का हिस्सा है।सरकार के निर्णयों पर विपक्ष सवाल उठाएगा।विपक्ष के आरोपों का सरकार जवाब देगी। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क जनता के सामने रखेंगे। यही लोकतांत्रिक विमर्श है।समस्या तब पैदा होती है जब विमर्श की जगह गतिरोध ले लेता है।संसद में नारे लग सकते हैं। विरोध हो सकता है। सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाई जा सकती है।सदन के नियमों के भीतर रहकर तीखा राजनीतिक प्रतिरोध भी लोकतंत्र की शक्ति है। किंतु यदि यही प्रतिरोध लगातार कार्यवाही को रोकने लगे तो अंततः जनता के अधिकारों की आवाज़ भी उसी शोर में दब जाती है।आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को कठघरे में खड़ा करने की नहीं है।आवश्यकता सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अपनी जिम्मेदारी याद दिलाने की है।सरकार को विपक्ष की उचित माँगों पर चर्चा के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए।विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसका विरोध संसद की पूरी कार्यवाही को बंधक न बना दे। महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों पर सर्वदलीय संवाद को मजबूत किया जाना चाहिए। संसदीय समितियों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए।प्रश्नकाल और शून्यकाल को अधिक प्रभावी ढंग से संरक्षित किया जाना चाहिए।
जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में केवल विरोध प्रदर्शन के लिए नहीं भेजती।वह चाहती है कि उसके प्रश्न पूछे जाएँ।उसके मुद्दों पर चर्चा हो।सरकार से जवाब लिया जाए।बेहतर कानून बनाए जाएँ और देश की समस्याओं का समाधान खोजा जाए।करदाता यह जानना चाहता है कि संसद के संचालन पर खर्च होने वाला उसका पैसा किस प्रकार जनता के हित में परिवर्तित हो रहा है।किसान चाहता है कि उसकी फसल,सिंचाई और बाजार की समस्या संसद में उठे। युवा चाहता है कि रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता पर गंभीर चर्चा हो। छोटे कारोबारी चाहते हैं कि उनकी वित्तीय कठिनाइयों पर सरकार जवाब दे।गरीब नागरिक चाहता है कि शिक्षा,स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा उसकी पहुँच में हो।इन सभी अपेक्षाओं का लोकतांत्रिक केंद्र संसद ही है।
मानसून सत्र 2026 ने 12 विधेयकों के पारित होने की उपलब्धि हासिल की है।साथ ही लोकसभा की 19 प्रतिशत और राज्यसभा की करीब 39 प्रतिशत उत्पादकता का आँकड़ा भी छोड़ा है। यह आँकड़ा सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए आत्ममंथन का अवसर है।संसद का अगला सत्र केवल नए विधेयकों की सूची लेकर न आए। वह बेहतर संसदीय कार्यसंस्कृति लेकर आए।राजनीतिक मतभेद रहें। वैचारिक संघर्ष रहे।सरकार से सवाल पूछे जाएँ।विपक्ष की आलोचना हो। किंतु लोकतंत्र की मूल धुरी संवाद बनी रहे।अंततः संसद किसी सरकार की नहीं है।संसद किसी विपक्ष की नहीं है।संसद किसी एक राजनीतिक दल की भी नहीं है। संसद पूरे भारत की है।वहाँ व्यतीत होने वाला प्रत्येक मिनट जनता की अमानत है। वहाँ होने वाली प्रत्येक बहस लोकतंत्र की पूँजी है।वहाँ पारित होने वाला प्रत्येक कानून करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करता है।
इसलिए सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि राजनीतिक जीत और संसदीय जीत में अंतर है।किसी मुद्दे पर सरकार को घेर लेना राजनीतिक सफलता हो सकती है।किसी विधेयक को संख्या बल से पारित कर देना सरकार की संसदीय सफलता हो सकती है।किंतु लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तब होगी जब दोनों पक्ष मिलकर संसद को चर्चा,संवाद और जवाबदेही का प्रभावी मंच बनाएँ।
संसद चलेगी तो सवाल उठेंगे। सवाल उठेंगे तो जवाब माँगे जाएँगे।जवाब मिलेंगे तो जवाबदेही तय होगी।जवाबदेही तय होगी तो बेहतर कानून बनेंगे। बेहतर कानून बनेंगे तो देश की विकास यात्रा को नई गति मिलेगी।मानसून सत्र समाप्त हो गया है। अब समय है कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों इस सत्र के अनुभव से सीख लें। संसद में गतिरोध लोकतंत्र की नियति नहीं बन सकता।संसद का प्रत्येक मिनट जनता की अमानत है।इस अमानत का सम्मान तभी होगा जब शोर से अधिक संवाद होगा।गतिरोध से अधिक बहस होगी।राजनीतिक टकराव से ऊपर राष्ट्रीय उत्तरदायित्व दिखाई देगा।यही संसदीय मर्यादा है।यही लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व है। यही भारत के लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।