नई दिल्ली।
राजधानी दिल्ली में जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य की करीब 800 वर्षों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय देखने को मिल रहा है। उडुपी स्थित पेजावर अधोक्षज मठ के परमाध्यक्ष परमपूज्य श्री श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामी जी महाराज श्री वेदव्यास गुरुकुलम्, श्री कृष्ण धाम, वसंत कुंज में चातुर्मास कर रहे हैं। स्वामी जी ने दिल्ली में चातुर्मास को मध्व परंपरा के इतिहास का महत्वपूर्ण अवसर बताया।
चातुर्मास के दौरान प्रवचन में स्वामी जी ने कहा कि यह अवधि केवल तप, साधना और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को नैतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दिशा देने का अवसर भी है। उन्होंने अहिंसा, संयम, सेवा और लोककल्याण की भावना को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामी जी ने कहा कि संन्यासी परंपरा का उद्देश्य समाज से दूरी बनाना नहीं, बल्कि एक स्थान पर रहकर जनमानस का मार्गदर्शन करना है। आध्यात्मिक शिक्षण के साथ लौकिक ज्ञान, सामाजिक चेतना, संस्कारों के संरक्षण और समाज सुधार में संतों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक आत्मा में विद्यमान हैं। इसलिए मानव जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समाज और लोकहित के लिए कार्य करना भी होना चाहिए।
युवा पीढ़ी में भारतीय संस्कारों के संवर्धन पर जोर देते हुए स्वामी जी ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा आज भी समाज को सही दिशा देने में सक्षम है। चार वेद, 18 पुराण, रामायण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता केवल प्राचीन ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और कर्तव्यबोध के आधार हैं।
उन्होंने बच्चों के नामकरण में भी भारतीय संस्कृति की चेतना को महत्व देने की बात कही। स्वामी जी के अनुसार नाम अर्थपूर्ण और प्रेरणादायक होने चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहे।
भगवान श्रीराम के आदर्शों का उल्लेख करते हुए स्वामी जी महाराज ने कहा कि राष्ट्रीय जीवन में केवल धार्मिक आस्था पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके मूल्यों को व्यवहार में उतारना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर से आगे बढ़कर रामराज्य की अवधारणा को समझने और उसे जीवन में अपनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने रामराज्य को न्याय, सदाचार, कर्तव्य, लोककल्याण और धर्मसम्मत व्यवस्था का प्रतीक बताया। स्वामी जी ने “रामो विग्रहवान् धर्मः” का उल्लेख करते हुए भगवान राम को धर्म का साकार स्वरूप बताया। वहीं “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” के माध्यम से राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यबोध का संदेश दिया।
प्रवचन के दौरान स्वामी जी ने तत्त्ववाद दर्शन और जगद्गुरु मध्वाचार्य की परंपरा का उल्लेख करते हुए उडुपी में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण की बालरूप प्रतिमा से जुड़ी धार्मिक परंपरा पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि उडुपी के श्रीकृष्ण मंदिर में भगवान बालस्वरूप में विराजमान हैं। माता देवकी के वात्सल्य भाव से जुड़े इस प्रसंग को उन्होंने भक्ति, प्रेम और वात्सल्य का अद्वितीय प्रतीक बताया।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की इस दिव्य प्रतिमा का संबंध द्वारका से रहा और बाद में जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य ने उडुपी में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिष्ठा की। आज उडुपी का श्रीकृष्ण मंदिर भारतीय वैष्णव परंपरा के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में शामिल है।
इसी क्रम में श्री वेदव्यास गुरुकुलम्, श्री कृष्ण धाम में उडुपी की सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपरा की तर्ज पर तीन दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
गुरुकुलम् के निदेशक डॉ. आर. विठ्ठोबाचार्य एवं आचार्य महानिधि ने बताया कि महोत्सव का उद्देश्य राजधानी के लोगों को उडुपी की श्रीकृष्ण भक्ति परंपरा और भारतीय आध्यात्मिक विरासत से जोड़ना है।
महोत्सव के उद्घाटन समारोह में परमपूज्य श्री श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामी जी महाराज का दिव्य सान्निध्य एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ। समारोह में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा, केंद्रीय श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे, सांसद मीनाक्षी लेखी, सांसद मनोज तिवारी, विधायक अनिल शर्मा सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।